वाह रे पुलिस… शिकायतकर्ता खुद OBC और बाद में थोपा SC-ST एक्ट, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आरोपी को दी जमानत

HighLights
- मूल एफआईआर में नाम न होने पर आरोपी को मिली अग्रिम जमानत।
- शिकायतकर्ता स्वयं ओबीसी वर्ग से, बाद में जुड़ा था एससी-एसटी एक्ट।
- हाई कोर्ट ने निरस्त किया कोरबा विशेष न्यायालय का खारिज आदेश।
, बिलासपुर: कोरबा में जातिसूचक गाली-गलौज और मारपीट के मामले में हाई कोर्ट ने 26 वर्षीय युवक को अग्रिम जमानत दे दी है। कोर्ट ने पाया कि मूल एफआईआर में आरोपी त्रिभुवन पटेल का नाम नहीं था और एफआइआर दर्ज कराने वाला व्यक्ति खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित था।
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में मूल एफआइआर के स्तर पर अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध दर्ज करने का अवसर नहीं था। बाद में लिखित शिकायत के आधार पर आरोपी का नाम और अत्याचार अधिनियम की धाराएं जोड़ी गईं। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय ने यह आदेश पारित किया। मामला कोरबा के कोतवाली थाने में दर्ज अपराध से जुड़ा है।
अभियोजन के अनुसार 17 मई 2025 की घटना को लेकर उदय पटेल ने 19 मई 2025 को शिकायत दर्ज कराई थी। उदय पटेल अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं। शिकायत में चक्रधर मोहंती और उसके साथियों पर मारपीट करने तथा जाति के नाम पर गाली-गलौज करने का आरोप लगाया गया था।
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 296, 115(2) और 3(5) के तहत एफआईआर दर्ज की। महत्वपूर्ण बात यह रही कि मूल एफआइआर में त्रिभुवन पटेल का नाम नहीं था और उसमें एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं भी नहीं लगाई गई थीं।
मामले में बाद में उदय पटेल सहित अन्य लोगों की ओर से एक लिखित शिकायत दी गई। इसी आधार पर पुलिस ने त्रिभुवन पटेल का नाम आरोपियों की सूची में शामिल किया और अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(1)(घ) और 3(2)(वी) जोड़ी। त्रिभुवन पटेल ने गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए विशेष न्यायालय में अग्रिम जमानत की मांग की थी, लेकिन 19 जून 2026 को आवेदन खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में आपराधिक अपील दायर की।
बचाव पक्ष ने उठाया एफआइआर का आधार
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता वीआर तिवारी और अधिवक्ता विकास कुमार पांडेय ने दलील दी कि मूल एफआइआर में त्रिभुवन का नाम नहीं है। शिकायतकर्ता उदय पटेल भी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से नहीं बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं।
दलील दी गई कि मूल एफआइआर में अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं भी नहीं थीं। इसके बावजूद बाद में लिखित शिकायत के आधार पर धाराएं जोड़कर त्रिभुवन को आरोपी बनाया गया। यह महत्वपूर्ण पहलू ट्रायल कोर्ट ने ध्यान में नहीं लिया।
विशेष न्यायालय का आदेश निरस्त, गिरफ्तारी पर जमानत
इन परिस्थितियों और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए हाई कोर्ट ने 19 जून 2026 को विशेष न्यायाधीश (अत्याचार अधिनियम), कोरबा द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने त्रिभुवन पटेल को निर्देश दिया कि गिरफ्तारी होने की स्थिति में व्यक्तिगत बंधपत्र और समान राशि के एक स्थानीय जमानतदार को प्रस्तुत करने पर उसे जमानत पर रिहा किया जाए।
गवाहों को प्रभावित नहीं कर सकेगा
जमानत के साथ हाई कोर्ट ने शर्त लगाई है कि त्रिभुवन मामले से जुड़े किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धमकी, प्रलोभन या वादा देकर अदालत के सामने तथ्य बताने से नहीं रोकेगा। वह निष्पक्ष और शीघ्र सुनवाई में बाधा डालने वाला कोई काम नहीं करेगा।
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