पंच ‘परमेश्वर’ या ‘डाकू’, कुर्की तो दूर 20 साल से वसूली तक नहीं, बिलासपुर में लूट की हैरान करने वाली रिपोर्ट

HighLights
- मस्तूरी एसडीएम न्यायालय की हालिया रिपोर्ट ने खोली पोल
- 11 प्रकरणों में 26,90,800 की बकाया वसूली अब भी अधर में
- बच्चों का निवाला और मजदूरों का पसीना चट कर गए ‘माननीय’
, बिलासपुर। कहते हैं पंचायत का पंच ‘परमेश्वर’ होता है, लेकिन बिलासपुर जिले की मस्तूरी, बिल्हा, कोटा और तखतपुर तहसील में शासकीय फाइलों के पन्ने पलटते ही इस ‘परमेश्वर’ का असली चेहरा उजागर होता है।
जिन हाथों में गांव के बच्चों का भविष्य संवारने (सर्व शिक्षा अभियान), मजदूरों को रोजगार देने (मनरेगा, रोजगार गारंटी) और गरीबों के सिर पर छत या आंगनबाड़ी भवन बनाने की जिम्मेदारी थी, उन्हीं हाथों ने सरकारी खजाने पर ऐसा डाका डाला कि विकास वर्षों पीछे छूट गया।
हद तो तब हो गई जब जिम्मेदार अफसरों कुर्की करना तो दूर वसूली करना भी उचित नहीं समझा। वसूली के कागज कचरे के डिब्बे में हैं और पूर्व सरपंच-सचिव बेखौफ मौज काट रहे हैं।
क्या कहती है मस्तूरी एसडीएम न्यायालय की हालिया रिपोर्ट
मस्तूरी एसडीएम न्यायालय की हालिया रिपोर्ट कार्यालय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मस्तूरी द्वारा उपसंचालक पंचायत को भेजी गई हालिया मासिक रिपोर्ट (जून 2026) ने वसूली के दावों की हवा निकाल दी है। न्यायालय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मस्तूरी के अंतर्गत कुल 12 प्रकरणों में 38,59,400 की गफलत थी।
इसमें से अब तक केवल एक प्रकरण में 11,68,600 की राशि वसूल हो पाई है, जबकि 11 प्रकरणों में 26,90,800 की बकाया वसूली अब भी अधर में लटकी हुई है।
इन पंचातयों में जनप्रतिनिधियों ने किया था गबन
ग्राम कुकुर्दीकेरा: तत्कालीन सरपंच महेंद्र कुमार सेन, तत्कालीन सचिव विक्की आनंद व वर्तमान सचिव रामबाबू गेंदले पर 14,06,900 की सबसे बड़ी बकाया राशि दर्ज है।
ग्राम झलमला: तत्कालीन सरपंच राजेन्द्र साहू व तत्कालीन सचिव जयनारायण पाटनवार पर सी.सी. रोड निर्माण कार्य (कड़छा के घर से जनकराम के घर तक) के नाम पर 3,48,500 एवं अन्य निर्माण कार्यों में 1,48,000 की रिकवरी पेंडिंग है।
ग्राम मटिया: तत्कालीन सरपंच प्रमिला प्रजापति व सचिव देवप्रसाद पर नाली निर्माण कार्य हेतु 2,50,000 तथा 1,50,000 के गबन का मामला है।
ग्राम कर्रा: तत्कालीन सरपंच ललिता ध्रुव व तत्कालीन सचिव लक्ष्मेश्वरी साहू पर प्राथमिक शाला में रंगमंच निर्माण एवं अन्य कार्यों के 75,000- 75,000 के दो अलग-अलग प्रकरण दर्ज हैं।
ग्राम बिनौरी: तत्कालीन सरपंच सुरुज बाई एवं तत्कालीन सचिव प्रेमलाल कंवर पर बोर खनन एवं स्थापना कार्य (सुरेश के घर के पास) कार्य के 75,000 रुपये बकाया है।
ग्राम मुड़पार: तत्कालीन सरपंच कृष्णाबाई व तत्कालीन सचिव विवेक सिंह राठौर पर 40,000 की रिकवरी दर्ज है।
ग्राम नरगोड़ा: तत्कालीन प्रभारी सरपंच मनोज भोसले व सचिव टीकाराम चंद्राकर पर 30,000 की बकाया राशि दर्ज है।
कागजी निर्देश: आदेश में कहा गया है कि शेष 26,90,800 की वसूली हेतु तहसीलदार मस्तूरी, सीपत एवं पचपेड़ी को निर्देश देकर फाइल बंद कर दी गई थी।
वसूली का फ्लॉप शो
चारों तहसीलों में कुल मिलाकर 4 करोड़ 9 लाख रुपये से अधिक का सरकारी गबन हुआ। प्रशासन अब तक महज 95.29 लाख रुपये (लगभग 23.2फीसदी) ही वसूल पाया है, जबकि 3.14 करोड़ रुपये (लगभग 76.8फीसदी) आज भी भूतपूर्व सरपंचों और सचिवों की जेबों में सलामत हैं।
कोटा तहसील में हद दर्जे की लापरवाही
कोटा जनपद में 80.72 लाख के गबन के खिलाफ केवल 73,000 ही जमा कराए जा सके हैं। यानी वसूली दर 1 फीसदी से भी कम। कई मामलों में लिखा है, “सरपंच मृत” या “संबंधित द्वारा राशि जमा नहीं की जा रही”। प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और आरोपी बिना पाई चुकाए दुनिया से अलविदा कह गए या गायब हो गए।
बच्चों का निवाला और मजदूरों का पसीना चट कर गए ‘माननीय’
दस्तावेजों में दर्ज योजना के नाम बताते हैं कि यह भ्रष्टाचार सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि इंसानियत का भी था। दर्जनों पंचायतों (जैसे मस्तूरी के नरगोडा, कुकुर्दीकेरा, ठरकपुर, बिल्हा के उमरिया) में मासूम बच्चों के स्कूल, किचन शेड और पढ़ाई के पैसे डकार लिए गए।
रोजगार गारंटी (मनरेगा) के तहत पसीना बहाने वाले मजदूरों की मजदूरी के नाम पर जारी लाखों रुपये ( जोधरा के संजय पटेल का ₹5.18 लाख और कछार की बिमला बाई का 5.18 लाख का मामला) डकार लिए गए।
विधायक निधि, सीसी रोड व नाली निर्माण
ग्राम पंचायतों में बुनियादी विकास जैसे सी.सी. रोड, नाली निर्माण, बोर खनन व प्रकाश व्यवस्था का पैसा भी हड़प लिया गया। प्रशासन की ‘मेहरबानी’ या लचर तंत्र का नमूना एसडीएम दफ्तरों से जारी पत्रों में स्पष्ट लिखा है कि जनपद पंचायतें वसूली के लिए सहयोग ही नहीं कर रही हैं।
अधिकारी कठोर कार्रवाई करने में नाकाम रहे
एसडीएम कोटा द्वारा सीईओ तखतपुर को सन 2015 में लिखे पत्र में साफ शिकायत दर्ज है कि आरआरसी जारी होने के बावजूद अधिकारी वेतन से कटौती करने या कठोर कार्रवाई करने में नाकाम रहे। कहीं हाई कोर्ट की रिट पिटीशन का बहाना बनाकर फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया (जैसे बिल्हा का प्रकरण), तो कहीं आर.आर.सी. जारी न होने की बात कहकर केस ही समाप्त मान लिए गए।
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