छत्तीसगढ़ में चावल के दाम आसमान: जीरा राइस 90 से 120, काली मूंछ 65 से 85, श्रीराम 62 से 100, अब्बा हुजूर 70 से 110 किलो पहुंचा
छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ रहीं चावल की कीमतें। – अर्काइवHighLights
- चावल की कीमतों में 40 रुपये तक भारी उछाल
- दूसरे राज्यों से होने वाली आवक हुई प्रभावित
- स्थानीय स्तर पर महीन धान उत्पादन की मांग
, भिलाई। देश भर में ‘धान के कटोरे’ के नाम से अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले छत्तीसगढ़ के बाज़ारों में चावल की कीमत आसमान छू रही हैं। प्रदेश में रिकॉर्ड धान उत्पादन के बावजूद आम उपभोक्ताओं को थाली में परोसे जाने वाले चावल के लिए अपनी जेबें ढीली करनी पड़ रही हैं। दक्षिण और मध्य भारत के अन्य राज्यों से आने होने वाले लोकप्रिय और खुशबूदार चावल की किस्मों में 20 से लेकर 40 रुपये प्रति किलोग्राम तक का उछाल दर्ज किया गया है।
भिलाई और दुर्ग के खुदरा व थोक किराना बाजारों में कीमतों में आए उछाल ने मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है। दैनिक उपभोग में पसंद किया जाने वाला जीरा राइस, जो कुछ सप्ताह पहले तक 90 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, अब सीधे 120 रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गया है। इसी तरह 65 रुपये प्रति किलो बिकने वाला काली मूंछ चावल अब 85 रुपये में मिल रहा है। ‘जय श्री राम’ ब्रांड के चावल की कीमत 62 रुपये से उछलकर 100 रुपये प्रति किलो और ‘अब्बा हुजूर’ चावल 70 रुपये से बढ़कर 110 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुका है।
फसल क्षति और आपूर्ति में गिरावट बना कारण
व्यापारियों और थोक डीलरों के अनुसार छत्तीसगढ़ में मोटे और मध्यम धान की बंपर पैदावार होती है, लेकिन खुशबूदार और बारीक चावल के लिए स्थानीय बाजार काफी हद तक कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल पर निर्भर रहता है। हालिया बेमौसम बारिश और बाढ़ के कारण इन उत्पादक राज्यों में धान की फसलों को व्यापक क्षति पहुंचने की खबरें हैं। आपूर्ति श्रृंखला में आई इसी रुकावट के चलते मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है।
स्थानीय बारीक किस्मों को बढ़ावा देने की आवश्यकता
बाजार के जानकारों और राशन विक्रेताओं का मानना है कि राज्य सरकार को स्थानीय किसानों को बारीक और सुगंधित धान की खेती के लिए विशेष प्रोत्साहन, उन्नत बीज और तकनीकी मार्गदर्शन देना चाहिए। यदि छत्तीसगढ़ के भीतर ही बारीक चावल का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगे, तो दूसरे राज्यों से आयात पर लगने वाला भारी परिवहन खर्च बचेगा और आम जनता को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण चावल बेहद सस्ती दरों पर सुलभ हो सकेगा।
हर महीने बढ़ रहा रसोई का खर्च
चावल ऐसी जरूरत है, जिसे अधिकांश परिवार रोजाना खरीदते या इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में इसकी कीमत बढ़ने का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है। यदि कोई परिवार हर महीने 25 किलो चावल खरीदता है और उसकी कीमत में औसतन 30 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी होती है, तो उसे पहले की तुलना में 750 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे। कम आय वाले परिवारों के लिए यह रकम भी काफी मायने रखती है।
स्थानीय धान के बावजूद दूसरे राज्यों के चावल की मांग
छत्तीसगढ़ में धान का उत्पादन अधिक होने के बावजूद हर तरह के चावल की मांग स्थानीय उत्पादन से पूरी नहीं होती। अलग-अलग राज्यों में पैदा होने वाले चावल की किस्म, खुशबू, स्वाद और पकने की विशेषताओं के कारण लोग अपनी पसंद के अनुसार खरीदारी करते हैं। इसी वजह से दूसरे राज्यों से आने वाले चावल का भी बाजार बना हुआ है।
बारीक चावल के लिए प्रोत्साहित करे सरकार
छत्तीसगढ़ सरकार को प्रदेश में बारीक चावल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए किसानों को बेहतर बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। प्रदेश में ही बारीक चावल का पर्याप्त उत्पादन होने से उपभोक्ताओं को दूसरे राज्यों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
– विजय राठी, राशन दुकान संचालक, भिलाई
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