क्या चला पाएंगे सरकार? तारिक रहमान के खिलाफ कौन सी स्क्रिप्ट लिख रहे यूनुस मियां – भारत संपर्क

बांग्लादेश में नई सरकार सत्तारूढ़ हो चुकी है. 17 फरवरी को बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (BNP) के मुखिया तारिक़ रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली, लेकिन तारिक़ रहमान अपना राज-काज कैसे चलाएंगे? यह बहुत बड़ा मुद्दा है. 85 वर्षीय मोहम्मद यूनुस को सत्ता का चस्का लग चुका है इसलिए वे तारिक रहमान को मज़े से सत्ता नहीं चलाने देंगे. मोहम्मद यूनुस ने सरकार के मुख्य सलाहकार पद से हटते ही भारत के विरुद्ध एक ऐसा बयान दे दिया, जो तारिक रहमान को अपनी विदेश नीति चलाने के रास्ते में बड़ा अवरोध खड़ा कर गया है.
भारत के सात पूर्वोत्तर राज्यों (सेवन सिस्टर्स)- असम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल और मिज़ोरम की आइडेंटिटी अलग बता कर वे भारत की संप्रभुता को चुनौती दे गए. वे लगातार भारत के विरोध में इस तरह के अनर्गल प्रलाप करते रहे हैं. चीन में जा कर भी उन्होंने यही अलगाव की बात कही थी.
भारत के बिना बांग्लादेश की कल्पना असंभव
सत्य यह है कि भारत के बिना बांग्लादेश की कल्पना असंभव है. वह चारों तरफ से भारत से घिरा है. बस कुछ सीमा म्यांमार से मिलती है. इसके बावजूद मोहम्मद यूनुस का अनर्गल बयान वहां की चुनी हुई सरकारों को संकट में डालता रहता है. मोहम्मद यूनुस आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ रहे हैं और अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार भी उन्हें मिला हुआ है.
वे अपनी भारत विरोधी छवि के कारण जाने जाते रहे. उनका विरोध अवामी लीग की लीडर शेख़ हसीना वाज़ेद से भी रहा. किंतु BNP नेता ख़ालिदा जिया भी उनको पसंद नहीं करती थीं. हर एक को पता था कि मोहम्मद यूनुस पब्लिक के नेता भले न हों किंतु जोड़-गांठ में माहिर हैं. उनकी लालसा सत्ता हथियाने की सदा से रही है. इसके लिए उन्हें बांग्लादेश के चिर विरोधी पाकिस्तान और अमेरिका से भी हाथ मिलाने से भी गुरेज़ नहीं है.
मोहम्मद यूनुस के साथ तारिक रहमान.
बाइडेन की मदद से बने सरकार के मुखिया
अगस्त 2024 में जब शेख़ हसीना के खिलाफ भड़के असंतोष के कारण हसीना को भारत भाग कर आना पड़ा तो मौक़ा मोहम्मद यूनुस को मिला और वे अंतरिम सरकार के मुखिया (चीफ एडवाइज़र) बन बैठे. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन, भारत के विरुद्ध उसके पड़ोसी देशों में एक माहौल बनना चाहते थे. ऐसे में मोहम्मद यूनुस उनके काम आ गए.
भारत के विरुद्ध जहर उगलने में माहिर मोहम्मद यूनुस चीन जा कर भी यही राग अलाप आए. वे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का अभिभावक बांग्लादेश को मानते हैं. उनका कहना ये राज्य लैंड लाक्ड हैं, इन्हें व्यापार के लिए समुद्री रास्ता बांग्ला देश ही दे सकता है. भारत से इनका भूमि जुड़ाव सिर्फ 22 किमी चौड़े सिलीगुड़ी गलियारे से है. परोक्ष रूप से वे चीन के साथ गलबहियां कर इस सिलीगुड़ी गलियारे पर क़ब्ज़ा करने को उत्सुक थे.
सेवन सिस्टर्स पर यूनुस का बयान
किंतु राजनीति में शून्य मोहम्मद यूनुस भूल गये कि यदि भारत ने यही पहल कर बांग्ला देश के चटगांव पोर्ट पर धावा बोल दिया तो यूनुस के सपने धरे के धरे रह जाते. इसलिए शेख हसीना और ख़ालिदा जिया ने कभी भी ऐसे मुद्दे नहीं उठाए. चीन और अमेरिका की शाह पर मोहम्मद यूनुस उछले तो बहुत पर अंततः उन्हें बांग्लादेश में चुनाव करवाने पड़े.
अब वे नई BNP सरकार पर दबाव डाल रहे थे कि BNP के सांसद जुलाई चार्टर पर दस्तख़त करें, मगर BNP के लोगों ने इस चार्टर पर साइन नहीं किए और सरकार का गठन कर लिया. जुलाई चार्टर दरअसल एक संविधान सभा होगी जिसके जरिये वहां पर नया संविधान बनेगा, लेकिन संविधान के नवीनीकरण और उसमें बदलाव करने का अधिकार सिर्फ संसद को होता है. इसलिए BNP सरकार उस पर पुनर्विचार करेगी. इसके बाद संविधान संशोधन पर विचार करेगी.
BNP के रास्ते में कांटे बो रहे यूनुस मियां
BNP के असहयोग से मोहम्मद यूनुस का खिन्न होना स्वाभाविक है. इसलिए वे पग-पग पर नई सरकार के पथ पर कांटें बो रहे हैं. इसीलिए अपनी विदाई के वक्त उन्होंने सेवन सिस्टर्स का राग छेड़ दिया. बांग्लादेश बनने के बाद 1972 में दोनों देशों के बीच एक व्यापारिक संधि हुई थी पर कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई. भारत और बांग्ला देश दोनों व्यापार के लिए एक-दूसरे के सड़क, रेल और जल मार्ग के उपयोग को बेरोक-टोक बरतना चाहते हैं.
इसी के तहत भारत चटगांव पोर्ट पर ट्रांजिट की अनुमति चाहता है किंतु बांग्ला देश की अब तक की सारी सरकारें यह अनुमति देने से बचती रही हैं. क्योंकि चटगांव पोर्ट का इस्तेमाल यदि भारत करने लगा तो उनको लगता था भारत इस छोटे-से देश पर क़ब्ज़ा कर सकता है. किंतु 2018 में हसीना सरकार ने यह अनुमति दे दी थी. 2023 में इस समझौते को अंतिम रूप मिल गया.
शेख़ हसीना का भारत प्रेम
लेकिन 2024 के हिंसक विद्रोह के बाद से यह सुविधा बंद है. उलटे मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान को चटगांव पोर्ट पर ट्रांजिट की सुविधा दे दी. यह भारत को खुले आम चुनौती थी. शेख़ हसीना ने भारत को रेल ट्रांजिट की भी सुविधा दे दी थी. उनका कहना था कि दोनों देश संप्रभु हैं. किसी का एरिया बड़ा या छोटा होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. उलटे इस तरह दोनों देशों का व्यापार बढ़ेगा.
किंतु बांग्ला देश के लोगों को इस समझौते के विरुद्ध जमाते-इस्लामी ने भड़का दिया. छात्र जब वहां कोटे के लिए हसीना सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे तब यह मुद्दा भी अहम था. 2015 और 2018 में बांग्ला देश और भारत के बीच व्यापार मार्ग हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण समझौते हुए थे. इनके अनुसार भारत अपना माल चटगांव और मोगला पोर्ट से अपना माल अपने सेवन सिस्टर्स राज्यों को भेज सकता था।.
दोस्ती से बांग्लादेश को आर्थिक फ़ायदा
2023 में रेल मार्ग के माध्यम से माल ढुलाई का रास्ता साफ़ हुआ. भारत को माल ढुलाई की सुविधा देने से बांग्लादेश को आर्थिक फ़ायदा हुआ था. क्योंकि भारत बांग्ला देश को प्रति टन ट्रांजिट शुल्क देता था. मगर भारत विरोधी ताक़तों ने शेख़ हसीना को अपदस्थ करवा दिया. इनमें मोहम्मद यूनुस का रोल अधिक था. उन्होंने देश की उदारवादी और धर्म निरपेक्ष सोच वाली सरकार को ख़त्म करवा दिया.
साथ ही लगभग डेढ़ वर्ष का सत्ता सुख भी भोगा. उनकी रुचि बांग्ला देश में निर्वाचन करवाने की नहीं थी लेकिन बांग्लादेश की सेना के दबाव में उन्होंने चुनाव करवाए. उसमें भी काफ़ी देर कर दी. मोहम्मद यूनुस ने शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग को प्रतिबंधित करवा दिया और इसी बीच दिसंबर 2025 में ख़ालिदा जिया की मृत्यु हो गई. उनका बेटा तारिक़ रहमान लंदन में निर्वासन पर था, वह लौटा और ख़ालिदा जिया की पार्टी BNP ने उसे सिर आंखों पर लिया.
राष्ट्रपति की कुर्सी पर यूनुस की नजर
12 फ़रवरी को हुए चुनाव में BNP ने 300 सीटों वाली संसद में 209 सीटें हासिल कीं. इस तरह संसद में दो तिहाई सीटों पर उनका क़ब्ज़ा हो गया है. चुनाव 299 सीटों पर ही हुए थे. BNP जमात-ए-इस्लामी की तरह धुर दक्षिणपंथी तो नहीं है पर उसका झुकाव सेंटर टू राइट है. वह शेख़ हसीना की तरह अपनी आठ प्रतिशत हिंदू जनता को खुश कर पाएगी, इसमें संदेह है.
फिर भी जो दो हिंदू सांसद जीत कर आए हैं, वे BNP से हैं. अब सवाल उठता है कि क्या BNP उन्हें राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाएगी क्योंकि मौजूदा राष्ट्रपति मोहम्मद शाहबुद्दीन 23 अप्रैल 2023 को निर्विरोध निर्वाचित हुए थे. वे हसीना सरकार के समय बने थे इसलिए संभावना है कि तारिक़ मियां की सरकार इस पद पर अपने किसी व्यक्ति को बिठाएगी. इसके लिए मोहम्मद यूनुस के क़यास भी लगाये जा रहे हैं.
यूनुस की घाघ रणनीति से नहीं निपट पाएंगे तारिक़
इसमें कोई शक नहीं कि मोहम्मद यूनुस अब राजनीतिक रूप से बहुत कुशल हो चुके हैं. उनके सभी देशों के राष्ट्र प्रमुखों से अच्छे संबंध हैं. कूटनीति में माहिर हैं और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ. किंतु उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा इतनी बढ़ी हुई हैं कि उन पर क़ाबू पाना तारिक़ रहमान के बूते का नहीं. तारिक़ की मां प्रधानमंत्री रहीं और पिता पहले सेना प्रमुख और फिर राष्ट्रपति लेकिन तारिक़ का राजनीति में अनुभव शून्य है. ऐसे में वे कैसे यूनुस जैसे घाघ राजनीतिक से निपट पाएँगे!
उधर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक़ रहमान की जीत पर सबसे पहले बधाई दी. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को उनके शपथ ग्रहण समारोह में भेजा. मगर मोहम्मद यूनुस ने भारत विरोध का रूप दिखा दिया. यह तारिक़ मियां के लिए सही नहीं है. भारत का विरोध कर किसी सरकार का वहां बने रहना मुश्किल है.
