सपा के राज्यसभा प्रत्याशियों पर उठ रहे सवाल, क्या अखिलेश चयन करने में चूक ज… – भारत संपर्क

राज्यसभा चुनाव, उत्तर प्रदेश – समाजवाी पार्टी
उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने तीन उम्मीदवार उतारे हैं. सपा ने पूर्व नौकरशाह आलोक रंजन, जया बच्चन और रामजी लाल सुमन को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया है, जिसे लेकर पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह से आवाजें उठ रही है. सपा विधायक पल्लवी पटेल ने यहां तक कह दिया कि पार्टी के राज्यसभा प्रत्याशी को वोट तक नहीं करेंगे. अखिलेश ने 2024 के चुनाव में बीजेपी से मुकाबला करने के लिए पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समाज की एकजुटता का नारा दिया था, लेकिन राज्यसभा में पिछड़े और अल्पसंख्यक को मौका न देने की वजह से अपनों ही के निशाने पर हैं.
सपा पहली बार कैंडिडेट के चयन के चलते अपने नेताओं के निशाने पर नहीं आई बल्कि इससे पहले भी अखिलेश यादव कई बार सवालों के घेरे में आते रहे हैं. इस कड़ी में मुलायम सिंह यादव की सियासी विरासत संभालने के बाद से अखिलेश यादव एक के बाद एक सियासी चूक करते रहे हैं. अखिलेश यादव ने जिन नेताओं पर भरोसा जताते हुए राज्यसभा या फिर विधान परिषद भेजा, उनमें से ज्यादातर नेताओं ने उन्हें सियासी मझधार ही में छोड़ दिया और किनारा कर गए. यहां तक कि ये बीच कार्यकाल में भी पार्टी छोड़ गए. ऐसे में सवाल यह उठता है कि अखिलेश यादव राज्यसभा और एमएलसी के चयन करने में क्यों चूक जाते हैं?
मझधार में छोड़ गए सपा का साथ
अखिलेश यादव साल 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही मुलायम सिंह के सियासी वारिस के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश की. इसके बाद सूबे में उन्होंने पार्टी के तमाम नेताओं को राज्यसभा और एमएलसी के लिए भेजा, जिसमें कई नाम उनके नजदीकियों के थे. बसपा से सपा में सुरेंद्र नागर और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर 2014 का लोकसभा चुनाव हार गए थे, जिसके बाद अखिलेश यादव ने उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला किया. साथ ही अखिलेश ने लखनऊ के बिल्डर संजय सेठ को राज्यसभा भेजा, लेकिन सबने बीच कार्यकाल ही सपा छोड़ दी. 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ही तीनों ही नेताओं ने राज्यसभा और समाजवादी पार्टी से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया.
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सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 2022 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी के साथ मिलकर चुनाव लड़े. सपा 111 सीटें जीती और आरएलडी के 8 विधायक जीते थे. विधानसभा चुनाव के बाद राज्यसभा के चुनाव हुए तो अखिलेश यादव ने अपने कोटे से तीन राज्यसभा सदस्य भेजे थे, जिनमें सपा नेता के तौर पर सिर्फ जावेद अली को भेजा था. इसके अलावा वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को निर्दलीय और आरएलडी जयंत चौधरी को उच्च सदन भेजा. इन दोनों ही नेताओं पर पार्टी में तमाम असहमति के बीच अखिलेश ने उन्हें राज्यसभा के लिए भेजा.
आरएलडी के उस समय सिर्फ 8 विधायक थे और सुभासपा के 6 विधायक थे. यह दोनों ही पार्टियां सपा के साथ चुनाव लड़ी थी. जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजे जाने के बाद ही राजभर ने गठबंधन तोड़ लिया था, क्योंकि उनकी नाराजगी थी कि आरएलडी को दिया जा सकता है तो उन्हें क्यों नहीं. आरएलडी जयंत चौधरी 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सपा ने गठबंधन तोड़कर एनडीए में चले गए हैं. कपिल सिब्बल को राज्यसभा भेजा, जो सपा सदस्य के बजाय निर्दलीय के तौर पर गिने जाते हैं. सिब्बल कांग्रेस में कब वापसी कर जाएं, इसे लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता है, क्योंकि उन्होंने पार्टी छोड़ने के बाद किसी भी पार्टी में शामिल नहीं हुए.
सपा MLC बीच रास्ते साइकिल से उतरे
यूपी में सपा की सरकार बनने के बाद अखिलेश यादव ने तमाम नेताओं को विधान परिषद भेजा था. प्रतापगढ़ से अक्षय प्रताप सिंह को एमएलसी बनाया था, जो 2018 में सपा छोड़कर राजा भैया की पार्टी के साथ हो गए. सपा ने बुक्कल नवाब, यशवंत सिंह, सरोजिनी अग्रवाल, अशोक वाजेपई जैसे दिग्गज नेताओं को एमएलसी बनाकर विधान परिषद भेजा, लेकिन इन सबने बीच कार्यकाल में ही सपा की साइकिल से उतर गए. ये चारो ही नेता सपा छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए है, जिन्हें पार्टी ने बाद में विधान परिषद या फिर राज्यसभा भेजा.
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भी सपा के चार विधान परिषद सदस्यों रविशंकर सिंह पप्पू, सीपी चंद, रमा निरंजन और नरेंद्र भाटी ने भी सपा को अलविदा कह कर बीजेपी का दामन थाम लिया था. बीजेपी ने इन्हें बाद में एमएलसी का चुनाव लड़ाया था. अखिलेश यादव के अध्यक्ष रहते हुए ये चारो नेता एमएलसी बने थे, लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही साथ छोड़ दिया. इसके अलावा नरेश अग्रवाल को भी सपा ने राज्यसभा भेजा था, जिन्होंने कार्यकाल पूरा होने से पहले सपा छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था. अखिलेश यादव के एमएलसी के साथ छोड़ने के चलते सपा उच्च सदन में अपना नेता प्रतिपक्ष का पद भी खो दिया था.
सपा के चयन में कहां कर जाती चूक
सपा राज्यसभा और विधान परिषद सदस्यों के चयन करने में उस जगह पर गलती कर जाती है जब पार्टी के कैडर और नेताओं की जगह दूसरे दल से आए नेताओं को तवज्जो देती है. अखिलेश यादव के हाथों में सपा की कमान आने के बाद से इसी तरह के फैसलों की भरमार हुई है, जिसके चलते ही सियासी मझधार में वो साथ छोड़ दे रहें. इसके पीछे एक वजह यह भी है कि सपा के वैचारिक एजेंडे के साथ होने के बजाय अपने राजनीतिक हित साधने के लिए ये नेता आते हैं इसीलिए
जैसे ही सपा का सियासी ग्राफ डाउन होता है, ये दल-बदलू नेता बीजेपी के खेमे में चले जाते हैं. सपा के साथ छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं का इतिहास दलबदल का ही रहा है, जिसको अखिलेश यादव भाप नहीं पाते. पैरासूट कैंडिडेटों की जगह पर सपा अगर अपने कैडर या फिर पार्टी के पुराने वफादार नेताओं को राज्यसभा या विधान परिषद बनाने का फैसला करे तो उनके साथ छोड़ने का खतरा कम रहता है.