
बिलासपुर. करीब 22 वर्षों से संतान की उम्मीद लगाए बैठे मनेंद्रगढ़ के एक दंपती के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला राहत लेकर आया है. अदालत ने पति की उम्र 55 वर्ष से अधिक होने के आधार पर IVF यानी टेस्ट ट्यूब उपचार की अनुमति रोकने वाले आदेश को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग अधिकतम आयु निर्धारित है, लेकिन पति की उम्र सीमा पार कर जाने मात्र से पत्नी को उपचार के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता.
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की अदालत में हुई. दंपती ने 31 जुलाई 2026 को सक्षम प्राधिकारी द्वारा दिए गए उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें 57 वर्षीय पति की उम्र का हवाला देते हुए सहायक प्रजनन तकनीक से उपचार की अनुमति नहीं दी गई थी.
2013 में शुरू हुआ था संतान प्राप्ति का प्रयास
मनेंद्रगढ़ के सिविल लाइंस क्षेत्र में रहने वाली अर्चना तिवारी और उनके पति प्रदीप कुमार तिवारी लंबे समय से संतान प्राप्ति के लिए उपचार करा रहे हैं. वर्ष 2013 में अर्चना ने अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान यानी IUI उपचार कराया था. दो साल बाद 2015 में उन्हें गर्भधारण हुआ, लेकिन लगभग चार महीने बाद गर्भपात हो गया.
इसके बाद दंपती ने आगे के उपचार के लिए रायपुर स्थित आयुष टेस्ट ट्यूब केंद्र से संपर्क किया. चिकित्सकीय परीक्षण और विशेषज्ञों की सलाह के बाद केंद्र ने उन्हें उपचार के लिए उपयुक्त माना.
पति की उम्र बनी अनुमति में बाधा
दंपती ने 24 जून को उपचार के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था. हालांकि, 31 जुलाई को आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि पति की उम्र 57 वर्ष है, जबकि संबंधित कानून में पुरुष के लिए अधिकतम आयु 55 वर्ष निर्धारित है.
इसके बाद दंपती ने हाईकोर्ट का रुख किया. उनकी ओर से अधिवक्ता गगन तिवारी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि कानून में महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमा निर्धारित है. इसमें पति-पत्नी की संयुक्त आयु को आधार बनाकर उपचार पर रोक लगाने का कोई प्रावधान नहीं है.
कोर्ट ने प्रजनन के फैसले को निजता से जोड़ा
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि संतान प्राप्ति और प्रजनन से जुड़े फैसले व्यक्ति की निजता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित हैं और इन्हें संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे में देखा जाना चाहिए.
वहीं, राज्य की ओर से अधिवक्ता अनमोल शर्मा ने आवेदन खारिज किए जाने का बचाव किया. उनका कहना था कि संबंधित कानून में पुरुष के लिए 55 वर्ष की अधिकतम आयु स्पष्ट रूप से निर्धारित है और अदालत को व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर निर्धारित सीमा में छूट नहीं देनी चाहिए.
विधायिका ने संयुक्त आयु पर कोई रोक नहीं लगाई
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित कानून महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमा निर्धारित करता है. इसमें पति-पत्नी की संयुक्त आयु को उपचार की पात्रता का आधार नहीं बनाया गया है.
अदालत ने कहा कि जिस शर्त को कानून में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है, उसे अपनी ओर से जोड़ना उचित नहीं होगा. कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि अर्चना को चिकित्सकीय जांच में उपचार के लिए उपयुक्त पाया गया था और पति की उम्र के अतिरिक्त ऐसा कोई चिकित्सकीय आधार सामने नहीं आया, जिसके कारण उपचार पर रोक लगाई जाए.
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पूर्व आदेश को रद्द करते हुए दंपती को टेस्ट ट्यूब पद्धति से उपचार कराने की अनुमति दे दी. कोर्ट की टिप्पणी इस मामले में खास तौर पर महत्वपूर्ण है कि पति की निर्धारित आयु सीमा पार होने भर से उम्र के लिहाज से पात्र पत्नी को सहायक प्रजनन उपचार से स्वतः बाहर नहीं किया जा सकता.
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