बिश्रामपुर में हाहाकार… ट्रांसफार्मर जला और पंप खराब, 4 दिनों से पानी के लिए तरसे 2000 परिवार
जलने से खराब पड़ा मोटरHighLights
- बिश्रामपुर एसईसीएल कालोनी के 2000 आवासों में गंभीर जलसंकट।
- फिल्टर प्लांट के दो पंप ठप और ट्रांसफार्मर जला।
- नलों से पानी न आने से बोरिंग बनी सहारा।
न्यूज, बिश्रामपुर : कोयला उत्पादन में दिन-रात पसीना बहाने वाले एसईसीएल के कोयला कामगारों और उनके परिवारों को अपने ही आवासों में पीने के पानी के लिए जूझना पड़ रहा है। बिश्रामपुर की श्रमिक कालोनियों के दो हजार से अधिक आवासों में पिछले चार दिनों से गंभीर जलसंकट की स्थिति बनी हुई है। फिल्टर प्लांट के नदी प्लांट में दो पंप खराब पड़े हैं, वहीं जलापूर्ति व्यवस्था को संचालित करने वाला एक विद्युत ट्रांसफार्मर भी चार दिनों से जला हुआ है। नतीजतन एकमात्र चालू पंप के भरोसे अनियमित जलापूर्ति हो रही है। प्रबंधन की इस बदहाल व्यवस्था ने श्रमिक परिवारों का धैर्य जवाब दे दिया है।
एसईसीएल बिश्रामपुर क्षेत्र की बिश्रामपुर कालोनी में करीब 2250 आवास हैं। इन आवासों में रहने वाले कोयला कामगारों के परिवारों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए फिल्टर प्लांट स्थापित किया गया है, लेकिन रखरखाव में लापरवाही और समय पर मरम्मत नहीं होने के कारण यह व्यवस्था लगातार बदहाल होती जा रही है। श्रमिक कालोनियों में अनियमित जलापूर्ति के साथ दूषित पानी मिलने की शिकायतें भी नई नहीं हैं।
मरम्मत के नाम पर होने वाले खर्च और कार्यों की गुणवत्ता को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। वहीं जरूरी मशीनी कलपुर्जों की अनुपलब्धता को भी व्यवस्था की बदहाली का कारण बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार नदी प्लांट में जलापूर्ति के लिए तीन पंप लगाए गए हैं, जिनमें से दो पंप खराब पड़े हैं।
दो नंबर पंप का आवश्यक पार्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण वह करीब पखवाड़े भर से बंद है। वहीं दूसरे पंप के खराब होने से जलापूर्ति का पूरा दबाव एकमात्र चालू पंप पर आ गया है। स्थिति यह है कि एक विद्युत ट्रांसफार्मर भी पिछले चार दिनों से जला पड़ा है। इसके बावजूद वैकल्पिक व्यवस्था कर नियमित जलापूर्ति बहाल करने की दिशा में ठोस पहल नहीं होने से कालोनीवासियों की परेशानी लगातार बढ़ रही है।
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नगर पंचायत के बोरिंग बने श्रमिक परिवारों का सहारा
जलसंकट से जूझ रही श्रमिक कालोनियों की महिलाओं का कहना है कि एसईसीएल प्रबंधन को केवल कोयला उत्पादन और मुनाफे से मतलब रह गया है। जिन कामगारों की मेहनत से कोयला उत्पादन होता है, उनके परिवारों की बुनियादी जरूरतों की चिंता करने वाला कोई नहीं है। पानी के लिए सुबह से ही जद्दोजहद करनी पड़ रही है। नगर पंचायत प्रशासन द्वारा कालोनियों में कराए गए बोरिंग ही अब उनके लिए थोड़े बहुत सहारे का काम कर रहे हैं। महिलाओं का कहना है कि आखिर कब तक वे पानी के लिए इस तरह परेशान होती रहेंगी।
मरम्मत के दावों की खुल रही पोल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब फिल्टर प्लांट में बार-बार तकनीकी खराबी आ रही है तो इसके स्थायी समाधान के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए। पंपों के कलपुर्जे समय पर उपलब्ध क्यों नहीं कराए जा रहे। ट्रांसफार्मर खराब होने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई। मरम्मत के नाम पर होने वाले खर्च के बावजूद यदि जलापूर्ति व्यवस्था बार-बार चरमरा रही है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है। महज बैठकों और आश्वासनों से जलसंकट दूर नहीं होगा।
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