आत्महत्या के मामले में DSP अनामिका जैन के खिलाफ विभागीय जांच पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की रोक
Demo pic aiHighLights
- डीएसपी अनामिका जैन के खिलाफ विभागीय जांच में हाई कोर्ट की राहत।
- आपराधिक कोर्ट में बयान होने तक विभागीय गवाही टालने का निर्देश।
- दुर्ग जिले के पुरानी भिलाई थाने में दर्ज है आत्महत्या का केस।
, बिलासपुर। दुर्ग जिले के पुरानी भिलाई में महिला की आत्महत्या से जुड़े मामले में आरोपित पुलिस उप अधीक्षक अनामिका जैन के खिलाफ चल रही विभागीय जांच में हाई कोर्ट ने सीमित राहत दी है। जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने निर्देश दिया है कि आपराधिक मुकदमे में जिन गवाहों के बयान दर्ज होना बाकी हैं, उनकी गवाही विभागीय जांच में तब तक नहीं कराई जाएगी, जब तक उन गवाहों के बयान संबंधित आपराधिक न्यायालय में दर्ज नहीं हो जाते। इसके बाद विभागीय जांच नियमानुसार आगे बढ़ सकेगी।मामला 17-18 जुलाई 2020 को दुर्ग जिले में मुतिका सोनी की मृत्यु से जुड़ा है।
इस संबंध में पुरानी भिलाई थाने में अपराध क्रमांक 199/2020 के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 306 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया था। जांच के बाद आरोपितों के खिलाफ न्यायालय में अभियोग पत्र पेश किया गया।
विभागीय आरोप के अनुसार, 17 जुलाई 2020 की रात करीब आठ बजे अनामिका जैन एक अन्य महिला के साथ मुतिका सोनी के घर गई थीं। वहां कथित रूप से गाली-गलौज, अपमान और मानसिक प्रताड़ना की गई, जिससे उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया।
डीएसपी की दलील- पहले गवाही हुई तो बचाव प्रभावित हो सकता है
अनामिका जैन की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे में आरोपों का आधार, घटनाक्रम और गवाह काफी हद तक समान हैं। यदि विभागीय जांच में साझा गवाहों के बयान पहले दर्ज हो गए तो उन्हें अपना बचाव समय से पहले उजागर करना पड़ सकता है।
इससे आपराधिक मुकदमे में उनका पक्ष प्रभावित होने की आशंका है। राज्य शासन की ओर से इस मांग का विरोध करते हुए कहा गया कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा अलग-अलग प्रकृति के हैं। दोनों का उद्देश्य और साक्ष्य का स्तर भी अलग है। केवल आपराधिक मामला लंबित होने से विभागीय जांच रोकना जरूरी नहीं है।
यह भी पढ़ें- छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस पर 120 करोड़ का एजुकेशन हब और 50 ई-बसों की सौगात
पूरी जांच पर रोक नहीं, साझा गवाहों की गवाही टालने का निर्देश
हाई कोर्ट ने कहा कि सामान्य तौर पर विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा साथ-साथ चल सकते हैं। लेकिन जहां आरोप गंभीर हों, दोनों मामलों के तथ्य और साक्ष्य काफी हद तक समान हों तथा विभागीय जांच से आपराधिक मुकदमे में बचाव प्रभावित होने की आशंका हो, वहां परिस्थितियों के अनुसार विभागीय कार्रवाई के कुछ हिस्से टाले जा सकते हैं।
साझा गवाहों के बयान पहले दर्ज होना उचित
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में दोनों कार्यवाहियों का आधार एक ही घटना है और कई गवाह साझा हैं। ऐसे में न्यायहित में आपराधिक मुकदमे में साझा गवाहों के बयान पहले दर्ज होना उचित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच पर अनिश्चितकालीन रोक नहीं लगाई जा रही है। विभागीय अधिकारी ऐसे कदम उठा सकेंगे, जिनसे आपराधिक मुकदमे में अनामिका जैन का बचाव प्रभावित न हो। याचिका स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने साझा गवाहों की विभागीय जांच में गवाही आपराधिक न्यायालय में उनके बयान दर्ज होने तक टालने का निर्देश दिया।
Leave a Reply