बिहार: MLC उपचुनाव में नीतीश कुमार का दुर्ग ही हार गई जेडीयू, क्या ये 3…
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सियासी समीकरण को सेट करने में जुटे नीतीश कुमार को तिरहुत से बड़ा झटका लगा है. तिरहुत विधानपरिषद के उपचुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी चौथे स्थान पर चली गई है. तिरहुत को नीतीश कुमार का गढ़ माना जाता है. लोकसभा चुनाव में तिरहुत की 4 में से 2 सीटों पर जेडीयू ने बड़ी जीत हासिल की थी.
फिर MLC उपचुनाव में कैसे चूक गई जेडीयू?
तिरहुत विधानपरिषद सीट की संरचना शिवहर, मुजफ्फरपुर, वैशाली और सीतामढ़ी को जोड़कर किया गया है. इस चुनाव में स्नातक पास मतदाताओं ने अपना मतदान किया है. देवेश चंद्र ठाकुर के सांसद चुने जाने की वजह से तिरहुत में उपचुनाव की नौबत आई है. ठाकुर यहां लंबे वक्त से चुनाव जीतते रहे हैं. वे विधानपरिषद के सभापति भी रह चुके हैं.
पिछले चुनाव में ठाकुर ने एकतरफा यहां जीत हासिल की थी, लेकिन उपचुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी चौथे नंबर पर खिसक गई. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर जेडीयू से चूक कहां हुई?
क्या हार के फैक्टर बने 3 ब्राह्मण?
1. केके पाठक- तिरहुत सीट पर निर्दलीय वंशीधर ब्रजवासी ने जीत हासिल की है. वंशीधर पहले शिक्षक थे, लेकिन केके पाठक ने उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया था. वंशीधर ने इस बर्खास्तगी को पूरे चुनाव में मुद्दा बना लिया. पाठक को नीतीश कुमार का करीबी अधिकारी माना जाता रहा है.
पाठक पहले शिक्षा विभाग में अपर मुख्य सचिव थे. उस दौरान में पटना में भरे मंच से नीतीश कुमार ने पाठक की तारीफ की थी. पाठक के रहते शिक्षा महकमे में हड़कंप मच गया था.
उनके रहते हुए शिक्षकों में भारी नाराजगी देखने को मिली थी. हाल ही में सरकार ने शिक्षकों की नाराजगी को खत्म करने के लिए पाठक के कई बड़े फैसले पलटने की बात कही थी.
2. अभिषेक झा- जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता अभिषेक झा को पार्टी ने तिरहुत उपचुनाव में प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा था. इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर राजनीति में आए अभिषेक को जेडीयू के एक दिग्गज नेता का करीबी माना जाता है.
झा पूरे चुनाव में अपनी जीत का दावा तो करते रहे, लेकिन ऐसा कोई समीकरण फिट नहीं कर पाए, जिससे उनकी जीत सुनिश्चित हो. दिलचस्प बात है कि झा पूरी लड़ाई में भी नहीं दिखे. मतों की जब गिनती हुई तो झा शुरू से ही चौथे नंबर पर अटके रहे.
कहा जा रहा है कि हार की वजह झा की उम्मीदवारी है. झा के मुकाबले प्रशांत किशोर और आरजेडी ने मजबूत उम्मीदवार उतारा था. प्रशांत किशोर की पार्टी यहां दूसरे नंबर पर और आरजेडी तीसरे नंबर पर रही है.
3. देवेश चंद्र ठाकुर- 2008 से इस सीट पर देवेश ठाकुर जीत दर्ज करते रहे हैं. ठाकुर को नीतीश कुमार का करीबी माना जाता है, लेकिन तिरहुत में करारी हार के बाद ठाकुर रडार पर हैं. नीतीश सरकार के मंत्री जमा खान ने ठाकुर को निशाने पर लिया है. वरिष्ठ नेता आनंद मोहन भी इस हार के लिए अहंकार को जिम्मेदार मान रहे हैं.
पत्रकारों से बात करते हुए जमा खान ने कहा कि हार के लिए देवेश ठाकुर ही जिम्मेदार हैं. दरअसल, जमा हार के लिए ठाकुर के उस बयान को वजह बता रहे हैं, जो उन्होंने मुसलमानों को लेकर दिया था. लोकसभा जीतने के बाद ठाकुर ने कहा था कि मुझे मुसलमान वोट नहीं करते हैं.
कहा जा रहा है कि अनुभवी होने के बावजूद ठाकुर इस बार यहां का सियासी मूड नहीं भांप पाए, जिसकी वजह से जेडीयू तिरहुत में बुरी तरह पस्त हो गई.
गीत ने भी निभाई गेमचेंजर की भूमिका
तिरहुत के इस उपचुनाव में एक गीत ने भी बड़ी भूमिका निभाई. सरकारी नौकरी से बर्खास्तगी के बाद राजनीति में आए ब्रजवासी ने अपने कैंपेन में ‘सिर पर बांध कफन जो निकले बिन सोचे परिणाम रे, वीरों की ये बात है भाई, कायर का नहीं काम रे’ को थीम सॉन्ग बना लिया.
उन्हें सिंपैथी वोट भी जमकर मिले. जीत के बाद ब्रजवासी ने कहा है कि यह हार सरकार की है. सरकार अगर मुझे नौकरी से नहीं निकालती तो तिरहुत में इस तरह के परिणाम नहीं आते.
तिरहुत में विधानसभा की 28 सीटें
तिरहुत क्षेत्र में विधानसभा की कुल 28 सीटें हैं. मुजफ्फरपुर में सबसे ज्यादा 11, शिवहर में एक, सीतामढ़ी में 8 और वैशाली में विधानसभा की 8 सीटें हैं. 2020 के चुनाव में इन 28 में से 16 सीटों पर एनडीए को जीत मिली थी. 12 सीटों पर इंडिया गठबंधन ने जीत हासिल की थी.
2024 के लोकसभा चुनाव में तिरहुत की 4 लोकसभा सीटों पर एनडीए ने क्लीन स्विप किया है. वैशाली में लोजपा (आर), मुजफ्फरपुर में बीजेपी और सीतामढ़ी-शिवहर सीट पर जेडीयू ने जीत दर्ज की है.