अंग्रेजी मीडियम पढ़े हुए बच्चे बोलते हैं हिन्दी में रामायण के संवाद, छह पीढ़ियों की परंपरा, साल 1920 से 2026 तक का सफर
आदर्श रामलीला नाटक मंडली ने सहेज रखी परंपरा, HighLights
- एक शताब्दी पूरी कर चुकी भाटापारा की रामलीला
- आदर्श रामलीला नाटक मंडली ने सहेज रखी परंपरा
- अंग्रेजी मीडियम के बच्चे हिन्दी में बोलते हैं संवाद
, भाटापारा। अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई करने वाले बच्चे हिंदी में रामायण के संवाद बोलते हैं। कोई भगवान राम बनता है तो कोई लक्ष्मण और सीता की भूमिका निभाता है। मंच पर रामकथा के प्रसंग जीवंत होते हैं और दर्शक भक्ति के साथ अभिनय का आनंद लेते हैं।
मनोरंजन के साधन बदलने और नई पीढ़ी की जीवनशैली में आए बदलाव के बावजूद बलौदाबाजार जिले के भाटापारा की आदर्श रामलीला नाटक मंडली ने अपनी परंपरा को सहेज रखा है।
वर्ष 1920 में शुरू हुई यह रामलीला 107वें वर्ष में भी जारी है। छह पीढ़ियों की आस्था, स्थानीय कलाकारों के समर्पण और बच्चों की भागीदारी ने इसे शहर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बना दिया है।
रामलीला के शुरुआती दौर में वर्तमान आईडीबीआइ बैंक के पास मंचन होता था। उस समय रावण दहन वर्तमान तहसील कार्यालय के स्थान पर किया जाता था। बाद में पुराने गंज स्थित रामलीला मैदान आयोजन का प्रमुख केंद्र बना।
सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुई इस परंपरा में कभी बिजली विभाग का एक सदस्य मंचन के दौरान रोशनी की व्यवस्था संभालता था। आज भव्य मंच, आकर्षक प्रकाश व्यवस्था और संगीत के साथ रामकथा का मंचन किया जाता है, लेकिन इसकी मूल भावना अब भी वही है।
बच्चों के हाथों में रामकथा की कमान
इस रामलीला का सबसे दिलचस्प पहलू नई पीढ़ी की भागीदारी है। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे हिंदी संवादों के साथ रामायण के पात्रों को मंच पर साकार कर रहे हैं। आठवीं के विद्यार्थी कृपांश व्यास और शशांक शुक्ला बारी-बारी से भगवान राम की भूमिका निभाते हैं।
रोशन सीता माता का किरदार निभाते हैं, जबकि छठवीं के विद्यार्थी युग शर्मा, जिन्हें सभी वासु कहते हैं, लक्ष्मण की भूमिका में नजर आते हैं। बच्चों के साथ युवा भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। बिजनेस मैनेजमेंट का कोर्स कर रहे लव शर्मा पिछले पांच वर्षों से हनुमान की भूमिका निभा रहे हैं।
वे राजा दशरथ का किरदार भी निभाते हैं। भाटापारा के एक स्कूल में कामर्स पढ़ाने वाले उत्तरप्रदेश के सोनभद्र निवासी शिक्षक मनुवेंद्र रीत रावण की भूमिका निभाते हैं। आयुष तिवारी विभीषण और नमन मल कुंभकरण का किरदार निभाते हैं। धर्मपाल सोनी सूर्पणखा की भूमिका में नजर आते हैं।
मंच के पीछे भी पीढ़ियों का समर्पण
रामलीला की निरंतरता केवल कलाकारों के अभिनय से नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले लोगों की मेहनत से भी बनी हुई है। शिवनारायण गुप्ता वर्ष 1964 से कलाकारों का रंग-रोगन और रूप-सज्जा करते आ रहे हैं। अब उनके परिवार की चौथी पीढ़ी के आदित्य गुप्ता भी इस जिम्मेदारी में हाथ बंटा रहे हैं। इस तरह मंच पर दिखने वाले पात्रों को जीवंत बनाने की कला भी परिवार के भीतर आगे बढ़ रही है।
65 वर्षीय सूर्यकांत शुक्ला, जिन्हें लोग बाबू भैया के नाम से जानते हैं, महिला पात्रों की सज्जा करते हैं। वे स्वयं भी अपने समय में सीता माता की भूमिका निभा चुके हैं। वहीं मकान निर्माण के ठेकेदार हरिराम साहू पिछले आठ-नौ वर्षों से भगवान विश्वकर्मा का किरदार निभा रहे हैं।
अभिनय, संगीत और संचालन से सजता है मंच
रामलीला में हास्य और संगीत भी दर्शकों को जोड़े रखते हैं। पेशे से पत्रकार कोमल शर्मा और जगदीश वैष्णव अपने अभिनय से दर्शकों को हंसाते हैं। कृषि उपज मंडी में कृषक प्रतिनिधि की जिम्मेदारी निभाने वाले संदीप (मोनू) मल आयोजन की व्यवस्थाएं संभालते हैं।
मोहन ध्रुव, संदीप देवदास और दिगेश्वर साहू संगीत के माध्यम से मंचन को प्रभावी बनाते हैं। व्यास गद्दी की जिम्मेदारी प्रकाश चंद शर्मा, धनजी भाई जोशी, देवनारायण शर्मा और राम जी जोशी संभालते हैं।
वहीं बजरंग चौरसिया अपने अंदाज में मंच संचालन कर दर्शकों को बांधे रखते हैं। कलाकारों के साथ संगीतकारों, रूप-सज्जाकारों और आयोजन से जुड़े लोगों का सामूहिक योगदान इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है।
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छह पीढ़ियों की आस्था से जीवंत विरासत
संस्थापक महावीर प्रसाद द्विवेदी, महंत भगवान दास, कन्हैया लाल, शिव प्रसाद अग्रवाल और रामलाल केसरवानी ने जिस परंपरा की नींव रखी थी, वह आज भी स्थानीय लोगों के सहयोग से आगे बढ़ रही है। इस रामलीला की खासियत यह है कि यहां बुजुर्गों का अनुभव, युवाओं का समर्पण और बच्चों की प्रतिभा एक साथ दिखाई देती है।
भाटापारा की आदर्श रामलीला नाटक मंडली के लिए यह आयोजन केवल धार्मिक मंचन नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम है।
अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों का हिंदी में रामकथा का मंचन इस बात का उदाहरण है कि भाषा और समय बदलने के बावजूद सांस्कृतिक परंपराएं नई पीढ़ी के साथ आगे बढ़ सकती हैं। वर्ष 1920 में शुरू हुई यह यात्रा आज भी रामायण के आदर्शों और सामूहिक सहभागिता के सहारे जारी है।
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