‘मुर्दों से नहीं, जिंदा इंसानों से डर लगता है’, 1000 पोस्टमार्टम कर चुकीं डॉ. अंकिता खंडेलवाल की बेबाक कहानी

1,000 पोस्टमार्टम कर चुकीं डॉ. अंकिता खंडेलवाल ने बताया अपना अनुभव
HighLights
- 1,000 पोस्टमार्टम कर चुकीं डॉ. अंकिता खंडेलवाल ने बताया अपना अनुभव
- कभी उड़ जाती थी रातों की नींद, आज रोज 5-6 शवों का पोस्टमार्टम कर रहीं अंकिता
- दुर्ग की महिला डॉक्टर ने बनाया सुपेला अस्पताल को अपना कर्मक्षेत्र
तोषण साहू, नईदुनिया भिलाई। ‘मुर्दों से नहीं, जिंदा इंसानों से डर लगता है। मुर्दा आपका कुछ नहीं कर सकता, लेकिन जिंदा इंसान आपकी जिंदगी में गलत कर सकता है।’ करीब एक हजार पोस्टमार्टम कर चुकीं दुर्ग जिले की 31 वर्षीय डा. अंकिता खंडेलवाल की यह बात उनके पेशे के प्रति बदले नजरिए को बयां करती है। कभी जिस काम के बाद रातों की नींद उड़ जाती थी, आज वही उनके लिए चिकित्सकीय जिम्मेदारी और कर्तव्य का हिस्सा है।
लाल बहादुर शास्त्री शासकीय अस्पताल, सुपेला में पदस्थ डा. अंकिता वर्ष 2019 से पोस्टमार्टम सेंटर में सेवाएं दे रही हैं। अब तक वह करीब एक हजार शवों का पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। एक दिन में सर्वाधिक 10 शवों का पोस्टमार्टम करने का अनुभव भी उनके पास है। अस्पताल में वर्तमान में रोजाना औसतन पांच से छह शव पोस्टमार्टम के लिए आते हैं।
मेडिकल की पढ़ाई के दौरान शरीर की चीर-फाड़ की प्रक्रिया से परिचित होने के कारण उन्हें लगता था कि पोस्टमार्टम का काम मुश्किल नहीं होगा। लेकिन वर्ष 2019 में जब वास्तविक परिस्थितियों के बीच ड्यूटी शुरू हुई तो तस्वीर अलग थी। शुरुआती दिनों में पोस्टमार्टम के बाद खाना खाने तक का मन नहीं करता था। आंखें बंद करते ही शवों के दृश्य सामने आ जाते और रात में सपनों में भी वही दृश्य दिखाई देते थे।
परिचित का पोस्टमार्टम करना पड़ा
उनके लिए सबसे भावुक क्षण तब आया, जब उनके पिता के एक परिचित और मित्र का निधन हुआ। वह उन्हें अच्छी तरह जानती थीं और पोस्टमार्टम की जिम्मेदारी भी उन्हीं को निभानी थी। भावनाओं को नियंत्रित करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और चिकित्सकीय दायित्व पूरा किया।
त्योहार भी नहीं रोकता ड्यूटी
डा. अंकिता का कहना है कि पोस्टमार्टम की जिम्मेदारी दिन या त्योहार देखकर नहीं आती। आपात स्थिति में डाक्टर को हर परिस्थिति में तैयार रहना पड़ता है। डा. अंकिता ने दीपावली के दिन भी पोस्टमार्टम किया है। अपने मायके और ससुराल की पहली डाक्टर डा. अंकिता ने कठिन कार्यक्षेत्र को सेवा और पेशेवर जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया है।
पोस्टमार्टम भय नहीं जिम्मेदारी का विषय
धीरे-धीरे उन्होंने खुद को मानसिक रूप से मजबूत किया। अब उनके लिए पोस्टमार्टम किसी भय का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का विषय है। वह कहती हैं कि मेडिकल शिक्षा के दौरान ही डाक्टरों को ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार किया जाता है। जिस व्यक्ति का पोस्टमार्टम किया जाता है, उसे सामान्यतः वह व्यक्तिगत रूप से नहीं जानतीं। इसलिए भावनात्मक दूरी बनाए रखते हुए कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी करना संभव होता है।
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उनके लिए बच्चों का पोस्टमार्टम सबसे कठिन
डॉ. अंकिता के लिए छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोस्टमार्टम सबसे चुनौतीपूर्ण होते हैं। उन्होंने दो माह के बच्चे का भी पीएम किया है। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय सावधानी के साथ भावनाओं पर नियंत्रण रखना भी जरूरी होता है। ट्रेन और सड़क दुर्घटनाओं में शरीर को गंभीर क्षति होने से प्रक्रिया और जटिल हो जाती है। हत्या और आत्महत्या के मामलों में हर तथ्य और साक्ष्य को सुरक्षित रखना अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है।