पत्नी पर मारपीट के आरोप साबित नहीं कर सका पति, CG High Court ने ठुकराई तलाक की अपील
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति द्वारा लगाई गई तलाक की अपील को किया खारिज। – प्रतीकात्मक तस्वीरHighLights
- पत्नी के सिर में चोट लगने के बाद पति उसे ओडिशा में छोड़कर चला गया था
- पति ने इस दौरान दो से तीन महीने तक पत्नी का हालचाल भी नहीं पूछा था
- हाईकोर्ट में हुई बेटे की गवाही ने भी पति के दावे का समर्थन नहीं किया
, बिलासपुर। पत्नी पर मारपीट, गाली-गलौज और मानसिक प्रताड़ना देने के आरोप लगाकर तलाक मांगने वाले पति को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली। कोर्ट ने कहा कि पति अपने आरोपों को ठोस साक्ष्य से साबित नहीं कर सका। इसके उलट, साक्ष्य से सामने आया कि पत्नी के सिर में चोट लगने के बाद पति उसे ओडिशा में छोड़कर अपने गांव चला गया और दो से तीन महीने तक उसकी कुशलक्षेम भी नहीं पूछी।
पति ने वैवाहिक संबंध फिर शुरू करने से भी इन्कार किया था। इन परिस्थितियों में पत्नी पर क्रूरता और परित्याग का आरोप साबित नहीं होता। जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की पीठ ने 27 अक्टूबर 2026 को पति तुलश्वर प्रसाद चंद्र की अपील खारिज करते हुए सक्ती परिवार न्यायालय के 15 सितंबर 2023 के तलाक देने से इन्कार करने वाले फैसले को बरकरार रखा।
शादी के 13 साल बाद अलग रहने लगे थे
मामले के अनुसार, तुलश्वर प्रसाद चंद्र और रानू चंद्रा की शादी 21 मई 2002 को हुई थी। उनके दो बेटे गौरव और तरुण हैं। पति भारतीय सेना में कार्यरत था। पति का आरोप था कि पत्नी अक्सर उससे और उसके परिवार के सदस्यों से विवाद करती थी, गाली-गलौज और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना देती थी। उसने यह भी दावा किया कि अमृतसर में उसके रहने के दौरान पत्नी ने जहर खा लिया था।
15 मई 2014 को सामाजिक बैठक में 100 रुपये के स्टांप पेपर पर पत्नी ने भविष्य में ऐसा व्यवहार नहीं दोहराने का लिखित आश्वासन दिया था, लेकिन स्थिति नहीं बदली। पति के अनुसार, पत्नी 15 दिसंबर 2015 से अलग रहने लगी थी। इसी आधार पर उसने तलाक मांगा था।
पत्नी ने आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि उसने कोई लिखित समझौता नहीं किया था और न ही पति या बच्चों को छोड़कर गई थी। उसका आरोप था कि पति ने उसे और बच्चों को छोड़ दिया तथा दूसरी महिला कर्मचारी के साथ रहने लगा। उसने यह भी कहा कि पति ने बच्चों की पढ़ाई और भरण-पोषण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की, जबकि एक बेटा दिव्यांग है।
गवाह को घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी
हाई कोर्ट ने पाया कि पति ने खुद और मनीराम चंद्रा को गवाह के रूप में पेश किया था, लेकिन मनीराम ने जिरह में स्वीकार किया कि उसे कथित घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी। इसलिए उसकी गवाही पति के आरोपों को प्रमाणित नहीं करती। कथित समझौते को भी विधिवत साक्ष्य के रूप में पेश नहीं किया गया था और पत्नी ने उस पर हस्ताक्षर करने से इन्कार किया था। ऐसे में उसके आधार पर क्रूरता साबित नहीं मानी जा सकती।
कोर्ट ने जहर खाने की घटना को भी अपने आप में पत्नी की क्रूरता का प्रमाण नहीं माना। कहा कि इसके पीछे की परिस्थितियों का कोई ठोस साक्ष्य नहीं दिया गया। वहीं, पति की जिरह से सामने आया कि ओडिशा के बालिंगा में विवाद के दौरान पत्नी के सिर में चोट लगी थी। इसके बाद पति उसे वहीं छोड़कर अपने गांव चला गया और दो से तीन महीने तक उसकी सुध नहीं ली।
पत्नी को वापस लाने से भी किया था इन्कार
खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि परिवार परामर्श केंद्र और पत्नी की ओर से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए शुरू की गई कार्यवाही में पति ने पत्नी को वापस साथ रखने से इन्कार किया था। एक बच्चे की बीमारी के बावजूद उसके इलाज की व्यवस्था नहीं करने की बात भी सामने आई।
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कोर्ट ने कहा कि केवल अलग रहना परित्याग नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित पक्ष ने बिना उचित कारण और दूसरे की इच्छा के विरुद्ध वैवाहिक संबंध स्थायी रूप से समाप्त करने का इरादा बनाया था। इस मामले में पति ऐसा साबित नहीं कर सका।
साक्ष्य से उलटे यह संकेत मिला कि अलगाव के लिए पति का अपना व्यवहार जिम्मेदार था। पीठ ने परिवार न्यायालय के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई। तलाक की अपील खारिज करते हुए पति को अपील का खर्च वहन करने का निर्देश दिया।
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