छत्तीसगढ़ में 25 युवक भी नहीं हिला सके अष्टभुजी भगवान गणेश की प्रतिमा, 1884 से आज भी बिना विसर्जन पूरी होती है पूजा
राजनांदगांव के गोपालपुर में 1884 से विराजमान हैं स्वयंभू अष्टभुजी गणेशHighLights
- 25 युवक भी प्रतिमा को हिला नहीं सके
- बैलगाड़ी से ले जाने का प्रयास भी विफल
- 1884 में नागवंशी शासक ने कराई स्थापना
, राजनांदगांव। आमतौर पर गणेशोत्सव में गणपति की प्रतिमा स्थापित कर अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन किया जाता है, लेकिन राजनांदगांव जिले में एक ऐसा मंदिर भी है जहां यह परंपरा नहीं निभाई जाती। राजनांदगांव-खैरागढ़ मार्ग पर स्थित ग्राम गोपालपुर का अष्टभुजी गणेश मंदिर अपनी अनोखी मान्यता और चमत्कार के लिए जाना जाता है।
स्वयंभू है आठ भुजाओं वाली पाषाण प्रतिमा
गोपालपुर में भगवान गणेश की आठ भुजाओं वाली प्राचीन पाषाण प्रतिमा स्थापित है। ग्रामीण इसे स्वयंभू मानते हैं। स्थानीय निवासी श्याम सिंह और रूपेश के अनुसार वर्ष 2006 में जब मंदिर का निर्माण हो रहा था, तब नीम के पेड़ के नीचे विराजमान इस प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में ले जाने का प्रयास किया गया था।
25 युवकों के प्रयास के बाद भी नहीं हिली प्रतिमा
मंदिर निर्माण के दौरान करीब 25 युवकों ने एक साथ मिलकर प्रतिमा को उठाने की कोशिश की, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद प्रतिमा अपने स्थान से हिली तक नहीं। इसके बाद प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर दूसरी जगह ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन वह प्रयास भी सफल नहीं हो सका। ग्रामीणों की मान्यता है कि इसके बाद तत्कालीन सेवक को स्वप्न आया और फिर विशेष विधि से प्रतिमा को मंदिर के भीतर स्थापित किया जा सका।
1884 में हुई थी स्थापना, राजवंश से जुड़ा है इतिहास
स्थानीय इतिहास के अनुसार गोपालपुर और पास के सिंगारपुर गांव का संबंध खैरागढ़ राजवंश से रहा है। बताया जाता है कि करीब 1700 के आसपास सिंगारपुर परगना खैरागढ़ रियासत के अधीन था और इसका संबंध राजा टिकैतराय के शासनकाल से है। वहीं गोपालपुर की इस अष्टभुजी गणेश प्रतिमा की स्थापना 1884 में नागवंशी शासक उमराव सिंह के काल में हुई थी। इसके बाद सूबेदार ठाकुर प्रकाश सिंह गहरवार और उनके वंशजों ने इस प्रतिमा की पूजा और सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाया।
अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन नहीं, दो बाल्टी पानी से स्नान
इस मंदिर की सबसे अलग परंपरा विसर्जन को लेकर है। यहां गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक 11 दिन तक धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है। लेकिन अंतिम दिन प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता। पाषाण से बनी इस स्थायी प्रतिमा को अनंत चतुर्दशी पर केवल दो बाल्टी पानी से स्नान कराया जाता है और पूजा-अर्चना के साथ उत्सव का समापन किया जाता है। वर्षों से यहां इसी प्रतिमा की पूजा हो रही है।
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