छत्तीसगढ़ में बन रहा 6-लेन इकोनॉमिक कॉरिडोर, रायपुर से विशाखापट्टनम की दूरी होगी 132 किमी कम, बस्तर को मिलेंगे नए बाजार
रायपुर-विशाखापट्टनम कॉरिडोर से 5 घंटे में पूरा होगा लंबा सफर।HighLights
- रायपुर-विशाखापट्टनम कॉरिडोर से 5 घंटे में पूरा होगा लंबा सफर
- बस्तर के जंगलों से विशाखापट्टनम के पोर्ट तक सीधी कनेक्टिविटी
- दिसंबर तक पूरा होगा ₹20,000 करोड़ का इकोनॉमिक कॉरिडोर
, रायपुर। देश भर में कई बड़े एक्सप्रेसवे का निर्माण हो रहा है, लेकिन रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर अपने आप में बेहद खास है। लगभग 465 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर छत्तीसगढ़ के बस्तर, कांकेर और कोंडागांव जैसे क्षेत्रों से गुजरते हुए ओडिशा के नवरंगपुर व कोरापुट जिलों को जोड़ेगा और आंध्र प्रदेश के माध्यम से सीधे विशाखापट्टनम पोर्ट (बंदरगाह) तक पहुंचेगा। यह परियोजना केवल यात्रा का समय कम करने का माध्यम नहीं है, बल्कि मध्य भारत के समुद्र से दूर स्थित इलाकों को सीधे अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग से जोड़ने की एक दूरगामी पहल है।
दूरी में 132 किमी की कमी, समय आधा रह जाएगा
वर्तमान में रायपुर से विशाखापट्टनम के बीच की दूरी लगभग 597 किलोमीटर है, जिसे तय करने में करीब 13 से 14 घंटे का समय लग जाता है। नए 6-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर के तैयार हो जाने से यह दूरी घटकर मात्र 465 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे यात्रा का समय भी कम होकर 5 से 6 घंटे होने की उम्मीद है। करीब 16,482 करोड़ से 20,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना का निर्माण ‘हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल’ (HAM) के तहत 19 से अधिक पैकेजों में किया जा रहा है। इसे दिसंबर 2026 तक पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
बस्तर के स्थानीय उत्पादों को मिलेगा वैश्विक बाजार
इस कॉरिडोर का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से दुर्गम और पिछड़े माने जाने वाले वनांचल क्षेत्रों से गुजर रहा है। बस्तर, कांकेर, कोंडागांव के साथ-साथ ओडिशा के नवरंगपुर व कोरापुट जैसे जिलों में बेहतर सड़क कनेक्टिविटी स्थापित होने से स्थानीय कृषि व वनोपज को बड़े बाजारों तक पहुंचाना बेहद सुगम हो जाएगा। महुआ, इमली, धान और स्थानीय हस्तशिल्प जैसे उत्पाद रायपुर और विशाखापट्टनम के बाजारों तक तेजी से पहुंच सकेंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा।
घने जंगलों में बन रही 2.83 किमी लंबी ट्विन टनल
इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत कोंडागांव और कांकेर के मध्य बन रही 2.83 किलोमीटर लंबी 6-लेन ‘ट्विन टनल’ (जुड़वां सुरंग) है। दंडकारण्य के सघन वन क्षेत्र और दुर्गम पहाड़ियों को पार करने के लिए यह सुरंग बनाई जा रही है। इसके अलावा, ओडिशा सीमा के निकट पहाड़ी व घाटी वाले भू-भाग में प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुंचाए बिना सड़क निर्माण के लिए 1.8 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड वियाडक्ट भी निर्मित किया गया है।
वन्यजीव सुरक्षा के लिए 27 अंडरपास और साउंड बैरियर
उदांती सीतानदी टाइगर रिजर्व और संवेदनशील पारिस्थितिकी (ईको-सेंसिटिव) क्षेत्रों से गुजरने के कारण कॉरिडोर के निर्माण में वन्यजीवों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया है। जानवरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने और गाड़ियों के शोर-शराबे को नियंत्रित करने के लिए मार्ग में 27 से अधिक वाइल्डलाइफ अंडरपास, ओवरपास और आधुनिक साउंड बैरियर बनाए जा रहे हैं।
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लैंडलॉक्ड राज्यों के लिए बनेगा नया व्यापारिक मार्ग
छत्तीसगढ़ जैसे लैंडलॉक्ड (समुद्र सीमा से रहित) राज्य के लिए विशाखापट्टनम पोर्ट तक सीधी और सुगम पहुंच होना व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस कॉरिडोर के चालू होने से खनिजों, कृषि उपज और औद्योगिक सामानों को बंदरगाह तक पहुंचाना आसान और सस्ता होगा। इससे माल ढुलाई (लॉजिस्टिक्स) की लागत में भारी गिरावट आएगी और पूर्वी एशियाई देशों में निर्यात के नए अवसर खुलेंगे। दिसंबर 2026 में इसके पूर्ण होने के बाद यह कॉरिडोर मध्य भारत के विकास और कनेक्टिविटी का नया आधार स्तंभ साबित होगा।
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